आज हमने देखा एक दौड़
उसमें हम भी सवार थे,
लगा झटका, गिरा बच्चा,
औरत चिल्लाई,
यह है शहर की बस दौड़।
बस खुलती है, सिंगल खाती है,
बैलगाडी की चाल चलती हैं,
तभी समान नंबर की बस आती है,
बुलेट ट्रेन बन जाती हैं।
कोई पिसे, कोई मरे
टांग टूटे, हाथ घिसे
बस एक हैं लक्ष्य
मेरा बस सबसे आगे।
कानून हैं, चालान है
ट्रैफिक पुलिस हैं, सिंगल है
पर सब बेवस हैं,
क्योंकि टिकट पर कमीशन है।