आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोलकाता की बस दौड़

                
                                                         
                            आज हमने देखा एक दौड़
                                                                 
                            
उसमें हम भी सवार थे,
लगा झटका, गिरा बच्चा,
औरत चिल्लाई,
यह है शहर की बस दौड़।
बस खुलती है, सिंगल खाती है,
बैलगाडी की चाल चलती हैं,
तभी समान नंबर की बस आती है,
बुलेट ट्रेन बन जाती हैं।
कोई पिसे, कोई मरे
टांग टूटे, हाथ घिसे
बस एक हैं लक्ष्य
मेरा बस सबसे आगे।
कानून हैं, चालान है
ट्रैफिक पुलिस हैं, सिंगल है
पर सब बेवस हैं,
क्योंकि टिकट पर कमीशन है।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर