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उधार का बोझ

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सांसें अटकी रहती हर पल,
        
                                                    
                            
गर्दन पर लटकी तलवार,
एक पल भी न चैन मिले जब
सर पे हो कोई कर्ज, उधार।

मन मस्तिक रहते सांसत में,
कही न मिलता चैन करार,
बेस्वाद सा भोजन लगता,
जीवन लगता है, बेजार।

तनख्वाह सारा लूट जाता है,
मासिक किस्त की ऐसी मार,
फिर भी खतम नही होता है,
कर्ज की होती ऐसी भार।

रूखी सूखी खा लो यार,
खुशी रहेगी आपके द्वार,
मत पालो ये कर्ज का बोझ,
कभी न लो, कोई चीज़ उधार।
2 वर्ष पहले
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