सांसें अटकी रहती हर पल,
गर्दन पर लटकी तलवार,
एक पल भी न चैन मिले जब
सर पे हो कोई कर्ज, उधार।
मन मस्तिक रहते सांसत में,
कही न मिलता चैन करार,
बेस्वाद सा भोजन लगता,
जीवन लगता है, बेजार।
तनख्वाह सारा लूट जाता है,
मासिक किस्त की ऐसी मार,
फिर भी खतम नही होता है,
कर्ज की होती ऐसी भार।
रूखी सूखी खा लो यार,
खुशी रहेगी आपके द्वार,
मत पालो ये कर्ज का बोझ,
कभी न लो, कोई चीज़ उधार।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X