कौन हो तुम, कैसे हो तुम,
कैसी मिट्टी के बने हो तुम,
मुर्दा हो या ज़िंदा हो तुम,
तनिक नहीं शर्मिंदा हो तुम,
उफ़! बच्चों से बलात्कार,
इंसानियत करते शर्मसार,
छोटे बच्चे कितने प्यारे,
सबके होते राज दुलारे,
दिल के प्यारे-प्यारे टुकड़े,
होते हैं वो आँख के तारे,
सुन्दर बच्चों से ये संसार,
तुम कैसे न गये दिल हार,
अपना तुम्हें अक्स न दिखता,
छोटे बच्चों की आँखों में,
क्यूँ नहीं करता दिल ये तुम्हारा,
भरने को उन्हें बाहों में,
दिल की अनसुनी करके पुकार
कैसे करते हो तुम संहार,
मासूम हूँ मैं तो बच्ची हूँ,
परिपक्व नहीं हूँ कच्ची हूँ,
कितने गिरे हुए हो तुम,
कहती बात मैं सच्ची हूँ,
क्यूँ नहीं आता तुमको प्यार,
कर कैसे तुम लेते हो वार,
अरे भूल हवस को जाओ तुम,
और न ख़ुद को गिराओ तुम,
जिस कोख से तुमने जन्म लिया,
उस कोख अब न लजाओ तुम,
बच्ची हो या बड़ी हो नार,
ना करना तुम बलात्कार,
मानव रूप में जन्म लिया है,
मानवता का धर्म निभाओ,
बाल रूप में अल्लाह-ईश्वर,
जितना चाहे प्यार लुटाओ,
क्यूँ ना समझे तुम ये सार,
प्यार से चलता है संसार।
- ललिता राठौर'माही'
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