मत दीजिए बहाना वक्त का
पढ़ाई और प्यार की कोई उम्र नहीं होती
रहे बेखबर मेरे नूर से वो
खूबसूरती काबिलों के लिए पाक-ए-जेहन नहीं होती
रहती हैं आहटें हुक्मरानों को दादरी-हिसार की
ये बारिशें यूं ही बेमौसम नहीं होती
है खुदा गर क्यों मिलता नहीं फिर
पत्थरों पर दूध चढ़ाने की मुझसे रस्म नहीं होती
रोशन करते हैं रोशनी के दर को
अंधे हैं कुछ घरों में कभी रोशनी नहीं होती
कैसा भूखा है भगवान तेरा
हजारों टन चढ़ावे से भी भूख खत्म नहीं होती
लगाते है सर-माथे गीता-कुरान को
सड़कों पर जालिमों के लिए कोई सीता-मरियम नहीं होती
कर देते हैं विदाई लाखों में वालिद
पढ़ाने को बेटियां इनके पास रकम नहीं होती
जी जैसी जिंदगी उसी में धकेल दिया तूने
बस बेटों के लिए मां खुदगर्ज नहीं होती
ढिंढोरा पिटा क्या खूब भाई की कॉलेज दोस्त का
हमारी तनिक जान-पहचान तक हजम नहीं होती
कायदे दुनिया-दारी के जो हमने बनाए होते
चौराहे पर फसाद दीवारों में कैद मोहब्बत नहीं होती
मैं बागी हूं, बगदादी नहीं
अपने ही घर मे जिसके लिए दो गज जमीं नहीं होती
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।