आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
एक पल लगता
धुंए जैसा है
तो एक पल
ठहरे पानी जैसा है
आज चिडियों की
चहचहाहट नहीं सुनी
घर की खिडकियॉ तो
आज भी खुलीं थीं
फिर आज ये
मौसम का रूख कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
बहती हवा जैसे
गुनगुनाना भूल गयी है
हर दिन की तरह
दरवाजे तक आयी तो थी
लगता जैसे
दस्तक देना भूल गयी है
आसमान के बादल तो
आज भी नहीं ठहरे
कौन जाने
इनका रूप कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
आज फिर सूरज को
मुस्कराते देखा मैंने
मुरझाये फूल पत्तियों को
फिर से जगमगाते देखा मैंने
चढते वक्त ने
जैसे सूरज की मुस्कराहट
छीन ली हो
इन तारों की सभा में
ये बर्फ जैसे वस्त्र पहने
कौन आया है
लगता तो चॉद ही है
फिर आज मुँह क्यों
छिपाया है
इस भरी सभा में
चॉद को ये डर कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है