आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज ये फिर सन्नाटा कैसा है

                
                                                         
                            आज ये फिर
                                                                 
                            
सन्नाटा कैसा है
एक पल लगता
धुंए जैसा है
तो एक पल
ठहरे पानी जैसा है
आज चिडियों की
चहचहाहट नहीं सुनी
घर की खिडकियॉ तो
आज भी खुलीं थीं
फिर आज ये
मौसम का रूख कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
बहती हवा जैसे
गुनगुनाना भूल गयी है
हर दिन की तरह
दरवाजे तक आयी तो थी
लगता जैसे
दस्तक देना भूल गयी है
आसमान के बादल तो

आज भी नहीं ठहरे
कौन जाने
इनका रूप कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
आज फिर सूरज को
मुस्कराते देखा मैंने
मुरझाये फूल पत्तियों को
फिर से जगमगाते देखा मैंने
चढते वक्त ने
जैसे सूरज की मुस्कराहट
छीन ली हो
इन तारों की सभा में
ये बर्फ जैसे वस्त्र पहने
कौन आया है
लगता तो चॉद ही है
फिर आज मुँह क्यों
छिपाया है
इस भरी सभा में
चॉद को ये डर कैसा है
कोई तो बता दे
आज ये फिर
सन्नाटा कैसा है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर