ज़रूरतें बदलती हैं, किरदार बदल जाते हैं…
मानसिक थकान
हमेशा बीमारी नहीं होती…
कभी-कभी
कुछ रिश्ते, कुछ लोग,
और कुछ हालात
इंसान को भीतर तक थका देते हैं।
अजीब बात है न—
जिन्हें हम
पूरे दिल से अपना समझते हैं,
उन्हीं के दिए हुए ज़ख़्म
सबसे देर तक रहते हैं।
हमने तो तुम्हें
तुम्हारी नादानी में पसंद किया था…
तुम्हारी सादगी में अपना-सा कुछ देखा था।
फिर तुम समझदार होते गए…
और शायद
हम तुम्हारी समझदारी में
अपनी जगह खोते गए।
आज रिश्तों की सच्चाई
सिर्फ़ घरों में नहीं,
कार्यालयों में भी दिखाई देती है।
जब तक आप
किसी के काम के हैं,
आपकी क़दर है।
आपकी ज़रूरत ख़त्म हुई,
तो बातचीत का लहज़ा बदल जाता है।
कल तक जो आपका था,
आज वही
आपकी जगह किसी और को देखकर
आगे बढ़ जाता है।
लेकिन अब शिकायत नहीं…
क्योंकि वक़्त ने सिखा दिया है—
हर अपना, अपना नहीं होता…
और हर दूर जाने वाला
आपका नुकसान नहीं होता।
कुछ लोगों का जाना
दरअसल
आपके भीतर का सुकून लौटना होता है।
इसलिए किसी के बदलने पर
ख़ुद को मत तोड़िए।
किसी के जाने पर
अपनी क़ीमत मत तौलिए।
और किसी की बेरुख़ी को
अपनी कमी मत समझिए।
क्योंकि—
हम चले जाएंगे,
कोई और आ जाएगा…
कहानियाँ वही रहेंगी,
बस किरदार बदल जाएगा।
वही दफ़्तर रहेगा,
वही मेज़ें रहेंगी,
वही रिश्ते बनेंगे…
बस आपकी जगह
किसी और का नाम लिख दिया जाएगा।
और शायद तब
किसी नए इंसान को भी
वही सब समझ आएगा
जो आज आपको समझ आया है।
यही ज़िंदगी है—
यहाँ कोई स्थायी नहीं,
सिर्फ़ हमारी यादें
और हमारे कर्म रह जाते हैं।
इसलिए जब तक किसी की ज़िंदगी में हैं,
सच्चे रहिए।
निस्वार्थ रहिए।
मगर इतना भी मत झुकिए
कि सामने वाला
आपकी अच्छाई को
आपकी कमजोरी समझ बैठे।
रिश्ते बचाइए,
लेकिन ख़ुद को बचाकर।
मोहब्बत कीजिए,
लेकिन अपनी इज़्ज़त के साथ।
क्योंकि आख़िर में
कहानी किसी एक किरदार की नहीं होती…
कहानी चलती रहती है—
हम चले जाते हैं,
कोई और आ जाता है…
और बस,
किरदार बदल जाता है।