राखी — एक धागा और कुछ सवाल
आज फिर कलाई पर राखी सजेगी,
फिर प्यार की बातें होंगी,
फिर तस्वीरों में भाई-बहन की
मुस्कुराती हुई मुलाकातें होंगी।
भाई कहेगा— “तेरी रक्षा करूँगा…”
बहन मुस्कुराकर सिर झुका देगी,
क्योंकि बचपन से उसे सिखाया गया है—
भाई की बात पर भरोसा करना।
मगर अजीब है ना ये रिश्ता भी…
रक्षा का वादा साल में एक दिन,
और बाकी दिनों में
बहन की भावनाओं की अनदेखी।
कलाई पर धागा बाँधना तो रस्म है,
बहन के दिल को न तोड़ना असली रिश्ता है।
वो महँगा तोहफ़ा नहीं माँगती,
न दुनिया भर की खुशियाँ…
बस जब अपने ही लोग उसे गलत समझें,
तब कोई कह दे—
“मैं हूँ, तू अकेली नहीं है।”
राखी के दिन भाई होना आसान है,
भाई बनकर निभाना मुश्किल।
इसलिए इस बार राखी बाँधते हुए
बस एक वादा करना—
मेरी रक्षा करने से पहले
मेरे सम्मान की रक्षा करना,
मेरी आवाज़ दबाने से पहले
उसे सुनना,
और मुझे समझाने से पहले
कभी मुझे समझना।
क्योंकि बहन को भाई की
हर वक्त पहरेदारी नहीं चाहिए…
उसे बस ऐसा भाई चाहिए,
जिसके सामने उसे
अपने आँसू छुपाने न पड़ें।