विज्ञापन

दो राहें

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दो राहें
        
                                                    
                            
हम दोनों चले थे
एक ही रास्ते पर—
हाथों में हाथ,
आँखों में एक ही सपना,
और मन में
उम्र भर साथ चलने का विश्वास।

फिर न जाने
किस मोड़ पर
रास्ते बदल गए।

तुम अपनी दिशा में बढ़ गए,
मैं अपनी राह पर
चुपचाप चलती रही।

पीछे मुड़कर देखा तो
हमारे बीच
सिर्फ़ दूरी नहीं थी,
एक पूरी कहानी थी
जो अधूरी रह गई।

रास्ते के बीच पड़ी
वह टूटी हुई अँगूठी
आज भी पूछती है—
क्या इतना आसान था
हमारे प्रेम को
एक दिन यूँ ही छोड़ देना?

सूरज डूब रहा था,
शायद दिन की तरह
हमारा रिश्ता भी
अपने अंतिम क्षणों में था।

आसमान में
इंद्रधनुष के रंग थे,
लेकिन मेरे भीतर
सब कुछ धूसर हो चुका था।

तुम चले गए—
मैंने रोका नहीं,
क्योंकि प्रेम
किसी को बाँधकर रखने का नाम नहीं।

बस इतना चाहती हूँ—
जहाँ भी रहो,
खुश रहो।

और अगर कभी
किसी सुनसान राह पर
तुम्हें कोई टूटी हुई अँगूठी दिखे,
तो उसे उठाना मत—

बस एक पल ठहरकर
याद कर लेना
कि कभी
इसी राह पर
हम दोनों
एक-दूसरे के हुआ करते थे।
-अनीता चतुर्वेदी
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all