आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दो राहें

                
                                                         
                            दो राहें
                                                                 
                            
हम दोनों चले थे
एक ही रास्ते पर—
हाथों में हाथ,
आँखों में एक ही सपना,
और मन में
उम्र भर साथ चलने का विश्वास।

फिर न जाने
किस मोड़ पर
रास्ते बदल गए।

तुम अपनी दिशा में बढ़ गए,
मैं अपनी राह पर
चुपचाप चलती रही।

पीछे मुड़कर देखा तो
हमारे बीच
सिर्फ़ दूरी नहीं थी,
एक पूरी कहानी थी
जो अधूरी रह गई।

रास्ते के बीच पड़ी
वह टूटी हुई अँगूठी
आज भी पूछती है—
क्या इतना आसान था
हमारे प्रेम को
एक दिन यूँ ही छोड़ देना?

सूरज डूब रहा था,
शायद दिन की तरह
हमारा रिश्ता भी
अपने अंतिम क्षणों में था।

आसमान में
इंद्रधनुष के रंग थे,
लेकिन मेरे भीतर
सब कुछ धूसर हो चुका था।

तुम चले गए—
मैंने रोका नहीं,
क्योंकि प्रेम
किसी को बाँधकर रखने का नाम नहीं।

बस इतना चाहती हूँ—
जहाँ भी रहो,
खुश रहो।

और अगर कभी
किसी सुनसान राह पर
तुम्हें कोई टूटी हुई अँगूठी दिखे,
तो उसे उठाना मत—

बस एक पल ठहरकर
याद कर लेना
कि कभी
इसी राह पर
हम दोनों
एक-दूसरे के हुआ करते थे।
-अनीता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर