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जिंदगी बतला गई

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खत्म होते होते सारी बात मुझ पर आ गई
        
                                                    
                            
मैं सुलझने जा रहा था फिर मुझे उलझा गई
हम सकूं में थे नजारे ऊंघ रहे थे बेखबर
एक हवा गुस्ताख़ सी जुल्फें तेरी बिखरा गई
इश्क से आगे भी है दुनिया कभी सुनते थे हम
कितनी दुश्वारी हुई जब बात खुद पर आ गई
तू महज इक ख्वाब है,दुनिया हकीक़त है महज
राज की ये बात मुझको जिंदगी बतला गई
आईनो की नुमाइश, शहर में अंधों के क्यों
पत्थरों की बारिशें फिर से हमें समझा गईं
जीते थे हम भी शराफत से कभी यह जिंदगी
जो नहीं बुझ भी सकी फिर तिश्नगी जगा गई
सह न पाई दरिया की गहराई दिल की उलझनें
मैं सकूं से डूबा फिर भी लाश तो उतरा गई
एक दिन पहले
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