विज्ञापन

ओस की तपिश

Ambrish Bhardwaj

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            दिसम्बर के महीने की
        
                                                    
                            
कड़क ठंड, जबरदस्त कोहरा
और तुषार इंसान, पशु, पक्षी
हर एक बेहाल सर्दी से

आज की सुबह-सुबह
जब हम-तुम, ओस पड़ी
हरी घास पर जब नंगे पैर
साथ साथ टहल रहे थे, तब,.....

कई बार तुम्हारे पैर के पंजे,
मेरे पैर के पंजे से छुए,
हर बार यही लगा कि,
"ओस" की भी "तपिश" होती हैं...!!

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7409 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13147 कविताएं

View Profile