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ओस की तपिश

Ambrish Bhardwaj

Mere Alfaz
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                            दिसम्बर के महीने की
        
                                                    
                            
कड़क ठंड, जबरदस्त कोहरा
और तुषार इंसान, पशु, पक्षी
हर एक बेहाल सर्दी से

आज की सुबह-सुबह
जब हम-तुम, ओस पड़ी
हरी घास पर जब नंगे पैर
साथ साथ टहल रहे थे, तब,.....

कई बार तुम्हारे पैर के पंजे,
मेरे पैर के पंजे से छुए,
हर बार यही लगा कि,
"ओस" की भी "तपिश" होती हैं...!!

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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