सारे गुनाह अपने सर उठा भी लूँ तो क्या
असल क़ातिल को ज़माने से बचा भी लूँ तो क्या
इबादतगाह की तरफ़ अब मेरे बढ़ते ही नहीं क़दम
मैक़दे में क़ाफ़िर सा जाम छलका भी लूँ तो क्या
ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि मेरा ख़ुदा पर यक़ीन न हो
जाकर पहलू में उसके दामन छुपा भी लूँ तो क्या
तू ही तो कहता है उसके बग़ैर एक पत्ता नहीं हिलता
फिर बेग़ैरती के क़िस्से सुना भी लूँ तो क्या
अजीत बदनाम हो गया सच बोलने की ख़ातिर
झूठ बोलकर ज़रा मुस्कुरा भी लूँ तो क्या
अजीत यादव
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