सोचता हूँ, राखी पर बहन को क्या दूँ,
जो मेरे बचपन की साथी है, उसे क्या दूँ।
वो आएगी, आँगन में फिर रौनक होगी,
उसकी हँसी के आगे भला मैं क्या दूँ।
कलाई पर जब बाँधेगी वो धागा प्यार का,
उस पावन से बंधन की कीमत मैं क्या दूँ।
अजीब दौर है, रिश्ते भी हिसाब माँगते हैं,
बहन को प्यार दूँ या कोई तोहफ़ा दूँ?
ज़माने ने पूछ लिया—“क्या दिया बहन को?”
मैं सोचता रहा, इस सवाल का जवाब क्या दूँ।
जिसने बचपन में मेरी हर खुशी बाँटी,
उसके हिस्से में भला कोई उपहार क्या दूँ।
वो दौलत नहीं माँगती, बस भाई का प्यार,
फिर इस रिश्ते को मैं रुपयों में क्यों तौलूँ?
मेरी बहन का आना ही मेरी राखी है,
उसकी मुस्कान से बढ़कर उसे क्या दूँ।
राखी तो बस एक धागा नहीं है हाथों का,
इसमें पूरा बचपन है, इसे मैं कैसे बाँट दूँ।
अगर कुछ देना है उसे इस राखी पर,
तो उम्र भर का साथ और ढेरों दुआएँ दूँ।