कविता: मेरी राखी
मेरी चार बहनें हैं,
चारों के अपने-अपने घर हैं,
अपनी गृहस्थी है,
अपनी जिम्मेदारियाँ हैं…
मैं समझता हूँ सब कुछ,
फिर भी आज दिल
कुछ समझना नहीं चाहता।
राखी आई तो
घर में चहल-पहल थी,
हर तरफ़ मिठाइयाँ थीं,
बहनों के संदेश थे,
भाइयों की कलाई पर
रंग-बिरंगे धागे थे…
बस मेरी कलाई
आज भी खाली थी।
सोचा था,
शायद कोई बहन आएगी,
दरवाज़े पर खड़ी होकर कहेगी,
“भैया, राखी बँधवाओ…”
मैं बचपन की तरह
उसकी कलाई पर नेग रख दूँगा,
और वह हँसकर कहेगी,
“इतना कम?”
लेकिन इस बार
दरवाज़े पर दस्तक नहीं हुई।
चारों बहनें
अपने-अपने परिवार में
इतनी व्यस्त हो गईं
कि शायद भाई के घर तक आने का
समय ही नहीं बचा।
मैंने किसी से शिकायत नहीं की,
न कोई सवाल किया,
न किसी को फोन करके कहा,
“तुम आई क्यों नहीं?”
बस चुपचाप
अपनी कलाई को देखता रहा।
फिर मेरी पत्नी ने कहा,
“मैं मायके जा रही हूँ,
भैया को राखी बाँधने…”
मैंने मुस्कुराकर कहा-“ज़रूर जाओ,
भाई-बहन का त्योहार है।”
वह चली गई…
उसके मायके में
राखी बँधी होगी,
मिठाइयाँ बँटी होंगी,
हँसी गूँजी होगी,
भाई की कलाई सजी होगी…
और इधर
मेरे घर की खामोशी में
मेरी कलाई
अपने हिस्से की राखी खोजती रही।
अजीब विडंबना है,
जिस दिन हर बहन
अपने भाई की कलाई सजाने निकलती है,
उस दिन चार बहनों का भाई
अपनी ही कलाई लेकर
अकेला बैठा था।
मैं नाराज़ नहीं हूँ बहनों से,
आख़िर उनकी भी अपनी दुनिया है।
धागा तो बाज़ार में भी मिल जाता है,
बहन का हाथ कहाँ मिलता है,
आज मेरी कलाई सूनी है,
पर मन में अब भी
चारों बहनों के लिए
वही प्यार है।
शायद अगले साल
कोई एक बहन आ जाए…
और अगर कोई न आए,
तो भी मैं यही कहूँगा
बहनों, खुश रहना…
तुम्हारी कलाई की खुशियों में ही
मेरी राखी बँधी है।
बस कभी फुर्सत मिले तो
अपने उस भाई को याद कर लेना,
जो हर रक्षाबंधन पर
तुम्हारा इंतज़ार करता है…
और जिसके लिए
राखी का असली अर्थ
धागा नहीं
बहन का साथ है।