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शाम कितनी सुनहरी

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चढ़ गई कहा चढ़ने से,
        
                                                    
                            
यह शाम कितनी सुनहरी है,
कोई होना भी कोई क्या होना,
यूं ही सही कोई क्या जीना।

यह चढ़ना भी कितनाशर्मिला सा है —
सूरज की पकड़ पर यही —
क्या करें नया सवेरा है।

चढ़ गई कहा...
चढ़ने से क्या हुआ है?
कितना सुनहरा है यह वक्त,
हमारे लिए ही कहा —
कहा — कहा —
क्या कहूं मेरी,
क्या लिखूं यह आँखें,
शर्मिली सी पलकें,
पवन भी आता है —
धड़कन भी शर्माती है।

चढ़...चढ़ गई कहूँ...
चढ़ने से क्या —
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
कितना सुंदर है हमारा प्यार यह,
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
4 घंटे पहले
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