चढ़ गई कहा चढ़ने से,
यह शाम कितनी सुनहरी है,
कोई होना भी कोई क्या होना,
यूं ही सही कोई क्या जीना।
यह चढ़ना भी कितनाशर्मिला सा है —
सूरज की पकड़ पर यही —
क्या करें नया सवेरा है।
चढ़ गई कहा...
चढ़ने से क्या हुआ है?
कितना सुनहरा है यह वक्त,
हमारे लिए ही कहा —
कहा — कहा —
क्या कहूं मेरी,
क्या लिखूं यह आँखें,
शर्मिली सी पलकें,
पवन भी आता है —
धड़कन भी शर्माती है।
चढ़...चढ़ गई कहूँ...
चढ़ने से क्या —
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
कितना सुंदर है हमारा प्यार यह,
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
चढ़ गई कहा चढ़ने से?
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