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भरोसा

Abdul Basit

Mere Alfaz
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                            हाथ से हम अपने आशियां लुटा बैठे,
        
                                                    
                            
किया जिस पर भरोसा धोखा उसी से खा बैठे,

अकेला छोड़ दिया उसने मुझे सहरा में,
जिसके मासूम चेहरे पर दुनिया लुटा बैठे,

लामकां मे आज फिरुं मैं दर-बदर,
अजनबी शहर में कहीं न जां गंवा बैठें।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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