विज्ञापन

श्रद्धांजलि पर शायरों के चुनिंदा अल्फ़ाज़...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  उठ गई हैं सामने से कैसी कैसी सूरतें 
रोइए किस के लिए किस किस का मातम कीजिए 
~हैदर अली आतिश

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा 
आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा 
~परवीन शाकिर
विज्ञापन

कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई 
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए 
~रहमान फ़ारिस

अब नहीं लौट के आने वाला
घर खुला छोड़ के जाने वाला
~अज्ञात

बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई 
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया 
~ख़ालिद शरीफ़

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
~अल्लामा इक़बाल

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों 
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं 
~मीर तक़ी मीर

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई 
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 
~कैफ़ी आज़मी

वे सूरतें इलाही किस मुल्क बस्तियाँ हैं 
अब देखने को जिन के आँखें तरसतियाँ हैं 
~मोहम्मद रफ़ी सौदा

लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं 
इक बुराई है तो बस ये है कि मर जाते हैं 
~रईस फ़रोग़
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10278 कविताएं

View Profile