नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उनकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया जा सकता है।
आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी
तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे
मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है
सर छुपाएँ तो बदन खुलता है
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे
तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये
परवीन की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है
परवीन शाकिर ने बहुत कम अरसे में शायरी में वो मुक़ाम हासिल किया, जो बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है। परवीन की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है। प्रेम की उत्कट चाह में भटकती हुई, वह तमाम नाकामियों से गुज़रती हैं, फिर भी जीवन के प्रति उसकी आस्था ख़त्म नहीं होती। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए, वह अपने धैर्य का परीक्षण भी करती हैं।
कमाल-ए-ज़ब्त को खुद भी तो आज़माऊँगी
मैं अपने हाथ से उसकी दुल्हन सजाऊँगी
परवीन शाकिर का जन्म पाकिस्तान के कराची में 24 नवंबर 1952 को हुआ। नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के ज़रिये अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उनकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया -
ये हवा कैसे उड़ा ले गयी आँचल मेरा
यूँ सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी
परवीन सिविल सेवा में चुनी गई और उन्हें कस्टम विभाग में तैनात किया गया
प्रेम और सौंदर्य के विभिन्न पक्षों से सुगन्धित परवीन शाकिर की शायरी हमारे दौर की इमारत में बने हुए बेबसी और विसंगतियों के दरीचों में भी अक्सर प्रवेश कर जाती है -
ये दुख नहीं कि अँधेरों से सुलह की हमने
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं
आपने किसी शायरा के बारे में सुना है कि उसने कोई लिखित परीक्षा दी हो और उस परीक्षा में उन्हीं पर एक सवाल पूछा गया हो। ऐसा पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर के साथ हुआ था जब उन्होंने 1982 में सेंट्रल सुपीरियर सर्विस की परीक्षा दी थी। नौ सालों तक अध्यापन करने के बाद परवीन सिविल सेवा में चुनी गई थीं और उन्हें कस्टम विभाग में तैनात किया गया था। परवीन शाकिर अव्वल दर्जे की शिक्षित महिला थीं क्योंकि उनके पास एक नहीं तीन-तीन "स्नातकोत्तर" की डिग्रियाँ थीं। परवीन शाकिर उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी पहली किताब "खुशबू" ने उन्हें "अदमजी" पुरस्कार दिलवाया। आगे जाकर उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार "प्राईड ऑफ परफ़ोरमेंस" से भी नवाज़ा गया। पहले-पहल परवीन "बीना" के छद्म नाम से लिखा करती थीं। वे "अहमद नदीम क़ासमी" को अपना उस्ताद मानती थीं और उन्हें "अम्मुजान" कहकर पुकारती थीं। परवीन की शायरी अपने-आप में एक मिसाल है।
परवीन शाकिर की शायरी का केन्द्रीय विषय 'स्त्री' है
परवीन शाकिर की शायरी का केन्द्रीय विषय 'स्त्री' है। प्रेम में टूटी हुई बिखरी हुई खुद्दार स्त्री। इनकी शायरी में प्रेम का सूफियाना रूप नहीं मिलता वह अलौकिक कुछ नहीं है जो भी इसी दुनिया का है। जिस तरह इब्ने इंशा को चाँद बहुत प्यारा है उसी तरह परवीन शाकिर को भीगा हुआ जंगल -
कह रहा है किसी मौसम कि कहानी अब तक
जिस्म बरसात में भीगे हुए जंगल कि तरह
तेरी चाहत के भीगे जंगलों में
मेरा तन मोर बन कर नाचता है
परवीन शाकिर के इन शेरों में घुटन के भीतर मुहब्बत कि तलाश दिखती है -
मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी
मेरे कबीले का हर फर्द क़त्लगाह में है
शाकिर के शेरों में लोकगीत की सादगी और लय भी है
शाकिर अपनी शायरी को किसी लंबे चौड़े दर्शन में नहीं बाँधती और अपने स्वाभाविक रूप में पेश करती हैं। पकिस्तान की ही प्रसिद्ध शायरा फहमीदा रेयाज़ के मुताबिक़, "परवीन शाकिर के शेरों में लोकगीत की सादगी और लय भी है और क्लासिकी संगीत की नफ़ासत भी और नज़ाकत भी। उनकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टीकेशन का दिलआवेज़ संगम है।"
दर्द क्या होता है बताएँगे किसी रोज़
कमाल की ग़ज़ल तुम को सुनायेंगे किसी रोज़
थी उन की ज़िद के मैं जाऊँ उन को मनाने
मुझ को ये वहम था वो बुलाएंगे किसी रोज़
उड़ने दो इन परिंदों को आज़ाद फ़िज़ाओं में
तुम्हारे होंगे अगर, तो लौट आएंगे किसी रोज़
जिस दिन परवीन शाकिर को कब्रस्तान में दफ़नाया गया, उस रात बारिश भी बहुत हुई
पाकिस्तान की इस भावप्रवण कवयित्री और ख़्वाब-ओ-ख़याल के चाँद-नगर की शहज़ादी को बीसवीं सदी की आखिरी दहाई रास नहीं आयी। 26 दिसंबर 1994 को इस्लामाबाद में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी। युवावस्था में ही वह अपनी महायात्रा पर निकल गयी।
कोई सैफो हो, कि मीरा हो, कि परवीन उसे
रास आता ही नहीं चाँद-नगर में रहना
जिस दिन परवीन शाकिर को कब्रस्तान में दफ़नाया गया, उस रात बारिश भी बहुत हुई, लगा आसमान भी रो पड़ा हो... सैयद शाकिर के घराने का ये रौशन चराग इस्लामाबाद के कब्रिस्तान की ख़ाक में मिल गया हो, लेकिन उसकी रौशनी और खुशबू अदब की दुनिया में रहती दुनिया तक कायम रहेगी।
8 वर्ष पहले