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'दिल्ली' शहर पर कहे गए शेर...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  दिल्ली सिर्फ देश बर की राजधानी ही नहीं है, साझा संस्कृति का केंद्र भी है। उर्दू शायरी के बड़े-बड़े दिग्गजों ने दिल्ली के रहन-सहन और तहज़ीबों को शायरी में बड़े सलीके से ढाला है। पेश है दिल्ली शहर पर शायरों के अल्फ़ाज़-  

दिल्ली कहाँ गईं तिरे कूचों की रौनक़ें 
गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं 
- जाँ निसार अख़्तर

दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है 
जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है 
- बशीर बद्र
 
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दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें 
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का 
- मीर तक़ी मीर

जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की 
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं 
- कैफ़ भोपाली

ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से 
दिल्ली 'ज़फ़र' के हाथ से पल में निकल गई 
- बहादुर शाह ज़फ़र

मरसिए दिल के कई कह के दिए लोगों को 
शहर-ए-दिल्ली में है सब पास निशानी उस की 
- मीर तक़ी मीर

ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से 
दिल्ली 'ज़फ़र' के हाथ से पल में निकल गई 
- बहादुर शाह ज़फ़र

मरसिए दिल के कई कह के दिए लोगों को 
शहर-ए-दिल्ली में है सब पास निशानी उस की 
- मीर तक़ी मीर

क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे 
शहर-ए-दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे 
- ज़ुबैर रिज़वी

दिल्ली में अपना था जो कुछ अस्बाब रह गया 
इक दिल को ले के आए हैं उस सरज़मीं से हम 
- मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हज़ारों लाखों दिल्ली में मकाँ हैं 
मगर पहचानने वाले कहाँ हैं 
- मोहम्मद अल्वी

दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब
रहते थे मुंतख़ब ही जहां रोज़गार के
- असलम फ़र्रुख़ी
6 वर्ष पहले
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