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जा रहा हूं जीवन की खोज में- दूधनाथ सिंह

हरि कर्की

Irshaad
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                                                  जा रहा हूं जीवन की खोज में
सम्भवत: मृत्यु मिले
सम्भवत: मिले एक सभ्य
सुसंस्कृत जीवन-व्यवहार
सांझ मिले बांझ
आंच न मिले
जीवन की राख मिले
दसों-दिशाओं में ।
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क्या ऐसा नहीं हुआ कई बार
कई तथागतों के साथ
कई शताब्दियों में
निरन्तर !

जब भी वह निकला उल्लास
लास भौतिक जीवन पर इठलाता
मिली उसे निरी उदासीनता
मिला उसे कठिन कंकाल
मिला उसे भव्य अन्तराल ।

क्या वह नहीं लौटा
विकल-विकल लिए
हाथों में अपना ही तरल रक्त
क्या उसकी आंखों से नहीं
टूटा, निपट उदास टिमटिमाता
सितारा एक?

पृथ्वी थोड़ी और
समृद्ध क्या नहीं हुई
उसके बाद !


साभार - कविताकोश 
5 वर्ष पहले
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