अब बिल की टेंशन खत्म: IIT दिल्ली ने बनाया हाइब्रिड AC; 33% कम होगी बिजली की खपत, जानें आम एसी से कैसे है अलग
IIT Delhi High Efficiency AC:
भीषण गर्मी और आसमान छूते बिजली के बिलों के बीच आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो एयर कंडीशनिंग (AC) की दुनिया को बदल देगी। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की ओर से तैयार किया गया यह नया हाइब्रिड AC, सामान्य AC की तुलना में बिजली की खपत को एक-तिहाई (लगभग 33%) तक कम कर देता है। जानें इसके बारे में विस्तार से....

विस्तार
देश में बढ़ती गर्मी और एयर कंडीशनर की तेज होती मांग के बीच आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने एक हाई-एफिशियंसी हाइब्रिड एसी तकनीक विकसित की है। यह नई तकनीक हवा से नमी हटाने के लिए लिक्विड डेसिकेंट और मेम्ब्रेन मॉड्यूल का उपयोग करती है और एसी की आउटडोर यूनिट से निकलने वाली बेकार गर्मी को दोबारा इस्तेमाल करती है। इससे 28% से 41.5% तक ऊर्जा बचत संभव है।
क्यों खास है यह एसी?
आमतौर पर हमारे घरों में लगने वाले एसी हवा को ठंडा करने और उसकी नमी सुखाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली खर्च करते हैं। लेकिन प्रो. अनुराग गोयल और उनकी टीम पीएचडी स्कॉलर अनंतकृष्णन के.सहित ने एक ऐसा हाइब्रिड मेम्ब्रेन-लिक्विड डेसिकेंट सिस्टम बनाया है जो बेकार जाने वाली गर्मी का इस्तेमाल करके कूलिंग करता है।
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कैसे काम करती है यह नई टेक्नोलॉजी?
- नमक के घोल से नमी का इलाज: इस सिस्टम में एक खास लिक्विड डेसिकेंट (नमक का घोल) इस्तेमाल होता है, जो बाहर की हवा से जलवाष्प यानी नमी को सोख लेता है।
- पॉलिमर मेम्ब्रेन का सुरक्षा कवच: हवा और इस घोल के बीच एक पतली पॉलिमर मेम्ब्रेन (झिल्ली) लगाई गई है, जिससे नमक के पार्टिकल यानी की कण कमरे की हवा में न मिलें।
- बेकार गर्मी का सदुपयोग: एसी की आउटडोर यूनिट (कंडेंसर) से जो गर्म हवा बाहर निकलती है, यह सिस्टम उसी वेस्ट हीट का उपयोग करके अपने नमक वाले घोल को फिर से सुखा लेता है। यानी अलग से बिजली खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती।
- बिजली की कमी: जहां एक साधारण एसी 1200 वॉट बिजली लेता है, वहीं यह हाइब्रिड एसी मात्र 800 वॉट में उतनी ही ठंडक देता है।
- इलाके के हिसाब से बचत: ज्यादा नमी वाले (Coastal) इलाकों में 28 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। वहीं, शुष्क यानी ड्राई वाले इलाकों में 41.5% तक की बचत होने का अनुमान है।
2019 में जारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान रिपोर्ट के अनुसार, 2038 तक कूलिंग के लिए बिजली की खपत तीन गुना बढ़ जाएगी। ऐसे में आईआईटी दिल्ली की यह तकनीक प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने और आम आदमी की जेब बचाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। यह रिसर्च हाल ही में मशहूर जर्नल ऑफ बिल्डिंग इंजीनियरिंग में भी प्रकाशित हुई है।
आम लोगों को क्या फायदा?
अगर यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर लागू होती है, तो इससे लाेगो का बहुत फायदा हो सकता है। जैसे बिजली बिल में बड़ी कमी, पावर कट की समस्या में राहत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण के अनुकूल कूलिंग। यह तकनीक खासतौर पर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन की गई है, जहां नमी और तापमान दोनों बड़ी चुनौती हैं।