काम बहुत हो रहा है पर हासिल कुछ नहीं: AI एजेंट्स के यूज को लेकर बड़ा खुलासा, क्यों इसे मेनिया कह रहे विशेषज्ञ?
एआई अब कोडिंग से लेकर रिसर्च और हमारे रोज के कामों तक पहुंच चुका है। एआई एजेंट्स की मदद से लोग कई ऐसे काम भी कर रहे हैं, जिनमें पहले काफी समय लग जाता था, लेकिन अब ऐसे में सवाल है कि क्या इन टूल्स का लगातार इस्तेमाल सच में प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है? या कभी-कभी यह सिर्फ व्यस्त रहने का एहसास दिलाता है। पूर्व एंथ्रोपिक इंजीरियर थारिक शिहिपार ने एआई एजेंट्स के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर कुछ ऐसा ही कहा है। उनका मानना है कि कोडिंग एजेंट्स के साथ काम करते हुए कई बार ऐसा लगता है कि बहुत कुछ किया जा रहा है, जबकि असल में कुछ खास काम नहीं हो पाता।

विस्तार
पूर्व एंथ्रोपिक इंजीनियर थारिक शिहिपार ने एक्स पर अपनी बातों को साझा करते हुए एआई एजेंट्स के लगातार इस्तेमाल को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कोडिंग एजेंट्स के साथ काम करते समय एक ऐसी स्थिति बन सकती है, जिसमें यूजर को हर वक्त कुछ न कुछ करते रहने और बहुत ज्यादा काम करने का एहसास होता है। थारिक ने इसकी तुलना मनोवैज्ञानिक स्थिति 'मेनिया' से की। उन्होंने लिखा कि कोडिंग एजेंट्स के साथ 100 प्रतिशत एक तरह की मेनिया आ जाती है, जिसमें लगता है कि आप बहुत कुछ कर रहे हैं और हर समय काम कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में कुछ नहीं हो रहा। उनके अनुसार, एआई एजेंट्स के साथ लगातार व्यस्त रहने का यह अनुभव जरूरी नहीं कि वास्तविक प्रोडक्टिविटी में भी बदले।
क्या है दूसरी परेशानियों से बचने का तरीका?
- इतना ही नहीं, थारिक शिहिपार ने एआई एजेंट्स के ज्यादा इस्तेमाल के पीछे एक दूसरी वजह की ओर भी इशारा किया। उनके अनुसार, कई बार लोग किसी दूसरी परेशानी या जिम्मेदारी से बचने के लिए भी लगातार एआई टूल्स में व्यस्त रह सकते हैं। उन्होंने इसे संभावित 'कोपिंग मैकेनिज्म' यानी मुश्किल भावनाओं या परिस्थितियों से निपटने के तरीके के रूप में देखा। थारिक ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'मुझे लगता है कि यह अक्सर जीवन में किसी और चीज से बचने का रूप होता है।'
- एक अन्य कमेंट में उन्होंने एक पोस्ट का लिंक भी साझा किया। उस पोस्ट में एडिक्शन की तुलना दर्द से राहत देने वाले एनेस्थीसिया से की गई थी। इसमें कहा गया था कि जिस तरह एनेस्थीसिया दर्द को कम करता है, उसी तरह एडिक्शन भी किसी तकलीफ से अस्थायी राहत दे सकते हैं। पोस्ट का तर्क था कि ऐसी आदतों को छोड़ने के लिए उस असली दर्द या परेशानी को समझना जरूरी है, जिससे बचने के लिए उनका सहारा लिया जा रहा है।
- हालांकि, थारिक की यह टिप्पणी उनका व्यक्तिगत नजरिया है। इससे यह साबित नहीं होता कि एआई एजेंट्स का इस्तेमाल करने वाले सभी लोग किसी परेशानी से बचने के लिए ऐसा करते हैं।
- थारिक शिहिपार पूर्व एंथ्रोपिक कर्मचारी थे। इसी महीने की शुरुआत में उन्होंने एंथ्रोपिक छोड़ा। वह कंपनी में क्लॉड कोड से जुड़े इंजीनियर्स रहे हैं। हालांकि, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कंपनी छोड़ने की वजह नहीं बताई है।
- उनकी हालिया पोस्ट ऐसे समय आई है, जब एआई एजेंट्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। कोडिंग एजेंट्स अब सिर्फ सुझाव देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यूजर के निर्देश पर कोड लिखने, उसमें बदलाव करने और कई चरणों वाले काम पूरे करने में भी मदद करते हैं।
- एआई एजेंट्स के साथ लगातार काम करने के अनुभव को लेकर थारिक अकेले नहीं हैं। 'वाइब कोडिंग' शब्द को लोकप्रिय बनाने वाले आंद्रेज कार्पथी ने भी इस साल की शुरुआत में अपने अनुभव साझा किए थे।
- उन्होंने बताया था कि एआई एजेंट्स के साथ काम करते हुए वह एक तरह की 'साइकोसिस' जैसी स्थिति में थे। नो प्रायर्स पॉडकास्ट पर उन्होंने कहा था कि मैं बस यह समझने की साइकोसिस जैसी स्थिति में हूं कि क्या संभव है, और इसे सीमा तक धकेलने की कोशिश कर रहा हूं।
- इतना ही नहीं, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन भी एआई के इस्तेमाल और काम को लेकर अपनी बातें साझा करते रहे हैं। इस साल अप्रैल में उन्होंने कहा था कि वह 'पॉलीफेजिक स्लीप' अपनाने जा रहे हैं। इस तरीके में व्यक्ति 24 घंटे के दौरान एक बार लंबी नींद लेने के बजाय कई बार सोता है।
- ऑल्टमैन ने इसकी वजह जीपीटी-5.5 कोडक्स की क्षमता को बताया था। उन्होंने लिखा था कि मैं पॉलीफेजिक स्लीप पर स्विच कर रहा हूं क्योंकि GPT-5.5 कोडेक्स में इतना अच्छा है कि मैं इतने लंबे समय तक सो नहीं सकता और काम से वंचित नहीं रह सकता। उनकी यह टिप्पणी AI टूल्स की बढ़ती क्षमताओं और उनके साथ ज्यादा समय बिताने के चलन को दिखाती है।