सुनिए कुंवर नारायण की कविता- अबकी बार लौटा तो

Hari Karki
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                            अबकी बार लौटा तो 
                                                                     
                            
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूंछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूंछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आंखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा
11 months ago

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