तीसरे पहर के मध्य प्रतिरोध करती हुई
और रात्रि के मध्य समेटती-सहेजती हुई
एक कमसिन लड़की की टकटकी ।
पढ़ने-लिखने के प्रति बेपरवाह,
उसका समूचा अस्तित्व दो स्थिर आँखों में सिमटा हुआ ।
दीवार पर रोशनी ख़ुद-ब-ख़ुद हट जाती है ।
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