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Urdu Poetry: मियाँ दाद ख़ां सय्याह की ग़ज़ल 'ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो'

miyan dad khaan sayyah famous ghazal qais jungle mein akela hai mujhe jane do
                
                                                         
                            


क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

लाल डोरे तिरी आँखों में जो देखे तो खुला
मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो

ठहरो तेवरी को चढ़ाए हुए जाते हो किधर
दिल का सदक़ा तो अभी सर से उतर जाने दो

मनअ' क्यूँ करते हो इश्क़-ए-बुत-ए-शीरीं-लब से
क्या मज़े का है ये ग़म दोस्तो ग़म खाने दो

हम भी मंज़िल पे पहुँच जाएँगे मरते खपते
क़ाफ़िला यारों का जाता है अगर जाने दो

शम् ओ परवाना न महफ़िल में हों बाहम ज़िन्हार
शम्अ'-रू ने मुझे भेजे हैं ये परवाने दो

एक आलम नज़र आएगा गिरफ़्तार तुम्हें
अपने गेसू-ए-रसा ता-ब-कमर जाने दो

सख़्त-जानी से मैं आरी हूँ निहायत ऐ 'तल्ख़'
पड़ गए हैं तिरी शमशीर में दंदाने दो

हश्र में पेश-ए-ख़ुदा फ़ैसला इस का होगा
ज़िंदगी में मुझे उस गब्र को तरसाने दो

गर मोहब्बत है तो वो मुझ से फिरेगा न कभी
ग़म नहीं है मुझे ग़म्माज़ को भड़काने दो

जोश-ए-बारिश है अभी थमते हो क्या ऐ अश्को
दामन-ए-कोह-ओ-बयाबाँ को तो भर जाने दो

वाइ'ज़ों को न करे मनअ' नसीहत से कोई
मैं न समझूँगा किसी तरह से समझाने दो

रंज देता है जो वो पास न जाओ 'सय्याह'
मानो कहने को मिरे दूर करो जाने दो

2 वर्ष पहले

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