'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अल्प, जिसका अर्थ है- थोड़ा, कम। प्रस्तुत है श्रीकांत वर्मा की कविता- मेरा विश्वास मेरी परछाई की तरह मेरे संग था
एक सुबह उठते ही लगता है
मेरा विश्वास
जो मेरी परछाईं की तरह
मेरे संग था
कल मुझको सोते में
छोड़कर चला गया—
मैं बूढ़ा हो गया हूँ।
छूटा जा रहा मेरा प्रेम। मैं बिल्कुल
अकेला हो जाऊँगा
क्या होगा!
किसको पुकारूँगा?
सारा दिन कैसे गुज़ारूँगा?
सोने के पहले अपने वस्त्र
क्या आईने में
अपना अकेलापन देखने के लिए उतारूँगा?
स्त्रियाँ जो प्रेमिका नहीं थीं न वेश्याएँ
बिस्तर पर
छाप की तरह
दूसरे सवेरे धुल जाती हैं।
केवल एक स्त्री की साड़ी की गंध
और चूड़ियों से
झरता हुआ दिन (या उसके साथ
पड़ा हुआ मैं
और पलंग से
उतरता हुआ दिन)
एक सुबह उठते ही लगता है
वह मुझको
छोड़कर चली गई। मैं अचानक
बूढ़ा हो गया हूँ...
क्या होगा? कैसे गुज़ारूँगा?
क्या मैं अपने गुज़रे जीवन को
एक काग़ज़ पर लिखी हुई
कविता की तरह
दूसरे काग़ज़ पर
उतारूँगा?
क्या मैं यह सोचूँगा
कि यदि मैंने उस पर शासन भी
किया होता
तो वह नहीं जाती!
और क्या मैं फिर
शासन के लिए
एक शासक का चेहरा
(जिसे उसने किसी और से लिया था)
जाकर उधार लाऊँगा?
क्या मैं एक स्त्री के लिए
नक़ली
तमंचा लिए
बस्तर पर लूँगा
अवतार?
क्या मैं उसी स्त्री से
फिर से
रचाऊँगा
विवाह?
आख़िर मैं लूँ भी तो किससे सलाह?
दिन चढ़ते-चढ़ते
मैं अकेला हो जाता हूँ।
मैं हरेक रास्ते पर कुछ दूर
चलकर
पाता हूँ
यह रास्ता
ग़लत था।
मेरा विश्वास जो मेरी परछाईं की तरह
मेरे संग था
मुझे छोड़ गया है
मैं अपनी दो टाँगों पर
टँगा हुआ
गठ्ठर हो गया
हूँ।
वह स्त्री
जो छोड़कर चली गई
जानती थी
मैं उसके वक्ष में छिपाए हुए
मुँह
एक शुतुमुर्ग़नुमा
ठट्ठर
हो गया हूँ।
मैं क्या करूँ?
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