उनमें जो मातृत्व था, वह गायकी से लेकर व्यक्तित्व तक में झलकता था: अंशुमान सिन्हा
इस बार आस्था के महापर्व छठ के पहले दिन ही ऐसी दुखद ख़बर आई कि छठ प्रेमियों का उत्साह अवसाद में बदल गया। पूजन-अर्चन के लिए स्वच्छ किए गए चमकते-दमकते घाट अचानक ही उदास हो गए। संस्कृति प्रेमियों के चेहरे मुरझा गए। लोकगीत गुमसुम हो गए। मानो कह रहे हों.. आह! हत भाग्य! छठ पर्व पर ही छठ की सुरीली कूक क्यों मूक हो गई..
गर्वीले चौड़े माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी। माँग में सिंदूर। सौभाग्य का टीका। गले में लंबी माला। सीधे पल्ले की साड़ी। चश्मे के भीतर से झाँकतीं बड़ी-बड़ी काली आँखें। बड़े से बड़े दुख और तनाव को मुँह चिढ़ाती सहज सरल मुस्कान। दिल में गहराई तक उतरती सादगी भरी आवाज़। परंपरा और संस्कृति की ध्वज पताका फहराता हुआ गरिमापूर्ण व्यक्तित्व..
जी हाँ दोस्तों! हम बात कर रहे हैं पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित लोकप्रिय लोक गायिका शारदा सिन्हा जी की। वही शारदा जी जिन्हें बिहार की स्वर कोकिला कहा जाता है। अंतिम साँस तक जो छठ के गीत गाती रहीं, अफ़सोस! वे अब हमारे बीच नहीं रहीं। 5 नवंबर, 2024 को छठ पर्व के पहले दिन दिल्ली एम्स में उन्होंने कैंसर से जूझते हुए 72 वर्ष की उम्र में अंतिम साँस ली। शायद छठी मैया ने ही अपनी दुलारी बिटिया को अपने पास बुला लिया..
वो सबकी माँ थीं, सबके करीब थीं..
शारदा जी के बेटे अंशुमान सिंह ने उनके निधन के बाद एक संक्षिप्त साक्षात्कार में कहा कि वह सबकी माँ थीं। सबके करीब थीं। उनमें जो मातृत्व था वह गायकी से लेकर व्यक्तित्व तक में झलकता था। इससे पूर्व उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर निधन की जानकारी देते हुए लिखा- "आप सबकी प्रार्थना और प्यार हमेशा माँ के साथ रहेगा। माँ को छठी मैया ने अपने पास बुला लिया है।"
लोक जीवन को दिया अमिट आलोक
शारदा सिन्हा जी जीवन भर लोकगीतों के माध्यम से लोक जीवन, लोक संस्कृति और लोक गायकी को अमिट आलोक प्रदान करती रहीं।
पहिले पहिले हम कईनी छठी मैया बरत तोहार
करिहों क्षमा छठी मैया भूल चूक ग़लती हमार..
सकल जगतारिणी हे छठी माता
सबक शुभकारिणी हे छठी माता
उगअ हो सुरुज देव..
केलवा के पात पर उग ले सुरुज देव..
ऐसे तमाम गीतों को अप्रतिम स्वर देकर लोकमानस और लोककंठ में रच- बस जाने वाली शारदा सिन्हा जी ने मैथिली गीतों के जरिए शुरूआत की थी। फ़िर हिंदी, भोजपुरी, बज्जिका और मगही गीत भी गाए। आपने अपने बड़े भाई की शादी के नेग के लिए पहला गीत गाया और यही गीत आपके पेशेवर जीवन का पहला रिकॉर्ड गीत हुआ।
आपने छठ गीतों से हर घर-हर दिल में खास जगह बनाई। बिहार के लोकगीतों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। होली और विवाह गीतों को सँजोने में महती भूमिका निभाई। आपकी गायकी में बिहार से पलायन और महिलाओं के संघर्ष को भी काफी जगह मिली है। मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन तथा गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी सुप्रसिद्ध फिल्मों में भी आपने गीत गाए जिन्हें खासी सराहना मिली।
शारदा जी ने मुझ जैसी महिला को सार्वजनिक मंच से गाने के द्वार खोले
शारदा सिन्हा जी के निधन से व्यथित लोक गायिका चंदन तिवारी ने उन्हें याद करते हुए लिखा कि शारदा जी ने मुझ जैसी महिला को सार्वजनिक मंच से गाने के द्वार खोले। शारदा जी से पहले बिहार के समय-समाज का जो दौर था, उसमें महिलाओं को सार्वजनिक मंच से गाने की छूट नहीं थी। गाने वाली महिलाओं को समाज अच्छी दृष्टि से नहीं देखता था। बिहार जैसे राज्य में महिलाओं के लिए लोक गायन का दायरा घर-परिवार में पारंपरिक गायन के अलावा बाईजी, थिएटर या फिर चुनिंदा कलाकारों के लिए आकाशवाणी तक ही सीमित था। शारदा जी ने इसे तोड़ा। आज सैकड़ों लड़कियाँ और महिलाएँ गायन कर रही हैं।
भगवान भास्कर और छठी मैया को अपने गीतों से देती थीं अर्घ्य
कभी एक साक्षात्कार में शारदा जी ने स्वयं बताया था कि वह छठ व्रत नहीं करती थीं। वह अपने गीतों से भगवान भास्कर और छठी मैया को अर्घ्य देती थीं। हर वर्ष छठ पूजा के अवसर पर वह अपना एक गीत छठी मैया के नाम जारी करती थीं। इस वर्ष अस्पताल में कैंसर से जूझते हुए भी उन्होंने इस परंपरा का निर्वाह किया। बेशक गीत का वीडियो तो नहीं बन पाया पर ऑक्सीजन पर रहते हुए भी उन्होंने दुनिया भर में फैले अपने प्रशंसकों और छठ-पूजकों के लिए ऑडियो फॉर्मेट में गीत गाया- " दुखवा मिटाई छठी मैया, रउए असरा हमार.."
इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है मानो वह अपने दुख से ज़्यादा सारी दुनिया के दुख को मिटाने की पुकार छठी मैया से कर रही हैं। उनके द्वारा गाए गए इस अंतिम गीत को उनके बेटे अंशुमान सिंह ने अस्पताल से ही रिलीज किया था।
उन्हें अभी मिथिला भाषा की रामायण गाने का काम करना था
शारदा सिन्हा जी के लिए लोकगीत लिखने वाले गीतकार हृदय नारायण झा ने उनकी गंभीर बीमारी के दौरान एक चैनल पर दिए इंटरव्यू में कहा कि उनका गाना हर घाट पर बजता है। उनके बिना छठ की कल्पना ही नहीं। उन्होंने गीत की साधना के साथ गीत के संस्कार को जिया पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। लोकगीत का ट्रेंड बदला। मेकअप, गेट अप, वेशभूषा बदल गई पर वह नहीं बदलीं। वह कोई लोकगीत गाती थीं तो उसको गाने के पहले दो-तीन माह रियाज करती थीं। एक-एक शब्द का सही उच्चारण करने के लिए प्रैक्टिस करती थीं।
वह नारी महाशक्ति हैं। नई पीढ़ी को उनका अनुकरण करना चाहिए। सांस्कृतिक परिदृश्य में उनके जैसी कोई बेटी नहीं। शारदा जी ने ही वर्ष 2016 के बाद आस्था, परंपरा और संस्कृति पर आधारित छठ गीतों का ट्रेंड चलाया। वह बिहार की बेटियों के लिए आदर्श हैं। हर रिश्ते को उन्होंने निष्ठा पूर्वक जिया। वे स्वस्थ होतीं तो मिथिला भाषा की रामायण गाने का काम करतीं।
यह सम्मान और स्नेह समाज का क़र्ज़ है हम पर
शारदा सिन्हा केवल इसलिए लोगों के दिलों पर राज नहीं करती थीं कि वह मीठे लोकगीत गाती थीं बल्कि इसलिए भी वह महान हैं क्योंकि अपार लोकप्रियता के बावजूद भी वह अहंकार से कोसों दूर बेहद विनम्र और सहज रहीं। लल्लन टॉप पर दिए गए एक इंटरव्यू में जब एंकर ने गीतकार राजशेखर के हवाले से कहा- " मेरे लिए तो छठ माने शारदा सिन्हा की आवाज़ है.." तो विनम्रता की प्रतिमूर्ति शारदा सिन्हा जी ने कहा- " राज शेखर जी ने जब यह कहा.. क्या मिथिला क्या मखाना। छठ माने शारदा सिन्हा जी का गाना.. हम तो भीग गए थे यह सुनकर। यह सम्मान और स्नेह समाज का क़र्ज़ है हम पर.."
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