आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अच्छी यात्रा पु्स्तक में लेखक के साथ पाठकों का एक लंबा काफिला भी साथ होता है: निर्मल वर्मा 

ओम व्यास: प्रेम की बहुत छोटी बूंद का विस्तार है 'आस्था'।
                
                                                         
                            बहुत साल पहले मैंने पुणे से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'राष्ट्रवाणी' में मराठी लेखक की पर्यटन कथा पढ़ी थी - उपन्यास और यात्रावृत्त का अद्भुत सम्मिश्रण - जिसमें एक नदी के किनारे बसने वाले लोगों की जीवनगाथा बुनी गई थी।
                                                                 
                            

नदी का प्रवाह और मनुष्य की नियति - दोनों कुछ इस प्रकार से जुड़े थे कि एक को दूसरे से अलग करना अस्म्भव था। कुछ ऐसा ही अविस्मरणीय अनुभव शोलोखोव के अमर उपन्यास 'और चुपचाप डान बहती रही' पढ़कर हुआ था। इन पुस्तकों को पढ़ते हुए मैं सोचा करता था कि अब तक अपनी हिंदी में इस तरह की 'नदी गाथा' पढ़ने को नहीं मिली जो उपन्यास की तरह लोगों के जीवन को अपने चिरंतन प्रवाह में प्रतिबिंबित कर सकें।

तब मुझे क्या मालूम था कि मेरी यह प्रच्छन्न आकांक्षा भोपाल की एक उनींदी दुपहर में अचानक पूरी हो जाएगी। याद नहीं आता कौन मुझे वह छोटी-सी दुबली-पतली किताब दे गया था, जिसके पन्नों पर कहीं-कहीं रेखाचित्र खिंचे थे, किंतु जो चीज आज भी याद रह गई है, वह था, पुस्तक का प्रांजल विनोद भरा, स्वच्छ प्रवाह, प्रवाह में बहता गद्य्। मानो जिस नदी का जादू भरा विवरण उसमें था, स्वयं उस नदी का स्पर्श लेखक की कलम को एक अजीब-सी पवित्रता प्रदान कर गया हो।

हिंदी में यात्रावृत्त पहले भी पढ़े थे, पर अमृतलाल बेगड़ की नर्मदा गाथा की रसमयता का स्वाद कुछ अनोखा ही था। यह एक अनूठा अनुभव था, जहाँ देखनेवाली आँख और दिखाई देनेवाला परिदृश्य इस तरह एकात्म हो जाते थे कि पता नहीं चलता था कहाँ लेखक के शब्द पढ़ते हुए हम स्वयं नर्मदा की स्वर-लहरी में उसकी अपनी आत्मगाथा सुनने लगते हैं।

यह यात्रावृत्त कदाचित् बेगड़जी की नर्मदा-यात्रा का पहला चरण था। इसके बाद जब कभी पत्र-पत्रिकाओं में किसी यात्रालेख या संस्मरण पर बेगड़जी का नाम दिखाई दे जाता, मैं उसे एक साँस में आद्योपांत पढ़कर ही दम लेता। जिस तरह बेगड़जी को नर्मदा परिक्रमा करते हुए खोए हुए यात्री मिल जाते थे, वैसे ही हर अंतराल के बाद मैं भी एक अदृश्य तट यात्री की तरह चुपचाप उनके साथ हो जाता। क्या वह विश्वास करेंगे कि जब वह नदी के किनारों पर गिरते-पड़ते चल रहे थे, दुर्गम चट्टानों को पार कर रहे थे, ठंडी रातों में किसी मंदिर के आँगन में लेटे हुए आकाश में टिमकते हुए तारों को निहार रहे थे - मैं उनके साथ था !
आगे पढ़ें

3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर