सावन माह में रिमझिम बारिश के बीच पेड़ों पर लगे झूले बहुत कुछ कहते हैं। प्रेम में डूबे जोड़े के लिए तो इसका एहसास बड़ा खुशनुमा होताा है। झूले में बैठी प्रेमिका चाहती है कि उसका प्रेमी उसे पीछे से पुश करते हुए झुलाए। और वो मदमस्त होकर सावन का भरपूर आनंद ले। झूले की रफ्तार उन दोनों के बीच के मन की डोर का एक इम्तिहान भी होती है।
धड़के जिया जैसे, पंछी उड़े...
आँचल ना छोड़े मेरा, पागल हुई है पवन
अब क्या करूं मैं जतन, धड़के जिया जैसे, पंछी उड़े
सावन के झूले पड़ गए तुम चले आओ
तुम चले आओ...
बॉलीवुड में सावन और उसकी बारिश को लेकर कई गीत रचे गए। 1979 में रिलीज हुई फिल्म जुर्माना में सावन, लाज और बरखा-बहार के बीच इश्क की पैमाइश को एक ठहराव देता गीत है। जिसे अमिताभ बच्चन, राखी और विनोद मेहरा पर फिल्माया गया है। गहरे शब्द और राखी का लाज भाव मुझे इस गीत का मुरीद बनाता है।
लता की आवाज पत्तों पर पड़ी बारिश की बूंदों की तरह है...
सावन के झूले पड़ गए तुम चले आओ
तुम चले आओ...
राहुल देव बर्मन के जादुई संगीत ने सदाबहार आनंद बक्षी के इस गीत को सुहावना अंदाज दिया है। लता मंगेशकर की आवाज पेड़ों के पत्तों पर पड़ी बारिश की बूंदों की तरह है, जो आंखों में पड़ती है तो मन को शीतल कर जाती है। नायिका राखी इसमें बहुत मनभावन लगी है। बिलकुल सावन की बरखा और फुहारों की तरह।
तुम चले आओ...
दिल ने पुकारा उन्हे, यादों के परदेस से
आती है जो देख के, हम उस डगर पे हैं कब से खड़े
सावन के झूले पड़ गए तुम चले आओ
तुम चले आओ...
गीत के बोल लाजवाब हैं। हर शब्द सावन की हरियाली और महक-मादकता अपने में समेटे हुए हैं। गीत में राखी अमिताभ को देखकर लाज से भर जाती है। अखियां नीचे कर अमिताभ के सामने आने से कतराती है। सावन में जब प्रेमी का चेहरा दिखता है तो दिल करार से भर जाता है। एक तरह से यूं कहे कि नायिका की लाज का सबेरा हो जाता है। इस गीत में राखी और अमिताभ के बीच कुछ ऐसा ही हो रहा है। प्रेमी के लिए प्रेमिका की तरफ से इससे बड़ा दूसरा कोई उपहार नहीं हो सकता।
हम कितने अन्जान थे...
जब हम मिले पिया, तुम कितने नादान थे
हम कितने अन्जान थे, बाली उमरिया में, नैना लड़े
सावन के झूले पड़ गए तुम चले आओ
तुम चले आओ...
सावन में प्रेमी मयूर मन उन्मुक्त होकर नाचने को बेताब हो उठता है। झूले देखने के बाद प्रेमिका तुरंत कहती है कि तुम चले आओ। पवन पागल हो गई है। मेरे आंचल को छोड़ नहीं रही है। तुम जिस डगर परदेस गए मैं वहीं खड़ी हूं। बाली उमर में तुमसे नैना लड़ गए। अनजाने में नैनों का टकराना मुझे विरह दे रहा है। सावन में विरह हरियाली के साथ और नया हो जाता है।
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