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Social Media Poetry: इस समय में बोलना कितना कठिन है

वायरल काव्य
                
                                                         
                            इस समय में बोलना कितना कठिन है 
                                                                 
                            
और चुप रहना कठिन उससे अधिक !

खो  गयीं  जयकार  में  सौ  प्रार्थनाएं 
अट्टहासों  में  घुली  हर  एक सिसकी 
इन्द्रजालों  में   फँसी    है  एक पीढ़ी 
कौन पहचाने यहाँ आवाज  किसकी 

मानता  हूँ  रात  है  तो   कालिमा  है 
किन्तु काले लगे दिन उससे अधिक !

सूर्य पर  अधिकार अंधों  ने  किया है 
और  उनके  घर  उजाला  जा रहा है 
बुद्धिजीवी   ढोल   तासे    पीटते  हैं 
सभ्यता का  शव निकाला जा रहा है 

जिस तरह के दृश्य सम्मुख आ रहे हैं
हो रहा है मन मलिन उससे अधिक !

पड़ गया ताला समय की व्यंजना पर
और चाभी खादियों  की  जेब  में  है 
काश ! ऐसा हो कि कोई  जान पाता 
पीर  कितनी  वक्त  की  पाजेब में है 

मौन  रहने  के लिये सिक्के मिले हैं 
किंतु हम पर लोक ऋण उससे अधिक !

साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से 

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6 दिन पहले

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