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'मिलो ना तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं...' इश्क़ की कश्मकश बयां करता गीत

हीर रांझा
                
                                                         
                            जीवन में सबसे कठिन काम है इश्क़ को मुकम्मल करना। कई प्रेम कर लेते हैं पर संकल्प के अभाव में उसे हासिल नहीं कर पाते हैं। जीवन भर भटकते रहते हैं। जीवन में प्रेम के आकार को साकार करने के लिए असीम धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है। इस जीवन में मानव समुदाय दो कारकों में विभक्त है। कहीं भी देखिए दो भागों में दुनिया बंटी है। सच-झूठ, धवल-श्यामल, सुबह-शाम, सुख-दुख, पुरुष-महिलाएं, पूर्व-पश्चिम सहित अन्य कारक हैं। इन दो कारकों के बीच एक 'तय' निष्कर्ष है। इसे ही हर किसी को पाना है।
                                                                 
                            
 
इश्क हो या संग्राम हो या आम जीवन का कोई काम हो। उसे उसके निष्कर्ष के साथ हासिल करना है। जीवन में मानव दो भागों में बंटा है। यूं कहें कि शरीर और आत्मा के बीच विभक्त है। स्‍थूल रूप में देखा जाए तो यह दोनों कारक आपस में बिलकुल मिले हुए हैं लेकिन सूक्ष्म रूप में इनके बीच आपस में काफी लंबा अंतराल है। गहरा अंतर है। यह अंतर है आदमी की सोच का, उसकी समझ का, उसके संस्कार का। ऐसे अंतर से ही मानव में विरोधाभास या दुविधा पैदा होती है। यह दुविधा या विरोधाभास सिर्फ और सिर्फ संकल्प से ही दूर होते हैं। जीवन में मानव को समय के साथ बहुत से विरोधाभासों का सामना करना पड़ता है। जब प्रेम करना और उस पर फैसला लेने की बात हो तब आदमी जीवन की सबसे बड़ी भंवर में फंस जाता है। मेरे अजीज फिल्मी नगमें सेक्‍शन में आज मैं हीर रांझा फिल्म के एक गीत का उल्लेख करना चाहूंगा। यह गीत मुझे अत्यंत प्रिय है। प्रेम की दुविधा को दिल से बयां करता यह गीत आज भी शादीशुदा होने के बाद मैं जब सुनता हूं तो मन में सिरहन पैदा हो जाती है। 

1970 में रिलीज इस फिल्म में मदन मोहन ने संगीत दिया है। कैफी आजमी साहब ने इस गीत को लिखा है। लता मंगेशकर की आवाज में यह गीत सुनहरी छटाएं बिखेरता है।     

'मिलो ना तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं
हमें क्या हो गया है?
तुम ही को दिल का राज बताये, तुम ही से राज छूपायें
हमें क्या हो गया है?'


ये पंक्तियां कहती है कि दो लोगों के बीच प्रेम का अंकुर भले ही चंद पलों में पहली नजर के साथ उभर आए लेकिन उस पर इश्क का गाढ़ा रंग चढ़ने के लिए काफी वक्त चाहिए। गहरी समझ चाहिए। विश्वास और सहयोग की भावना चाहिए। समर्पण चाहिए। तो...गाढ़ा रंग चढ़ने से पहले प्रेम पथिकों के मन में साथी के लिए एक भ्रम और दुविधा पैदा होते रहती है। इसी दुविधा को यह हसीन नगमा दिल से बयां करता है। गीत में कहा गया है कि प्रेम में पड़ने के बाद साथी को देखने के लिए मन मचल जाता है। पर जब साथी मिलता है तो आंख ढंग से नहीं मिलती। दिल का राज उससे छिपाने की इच्छा होती है या कभी मन कहता है कि सभी राज उसके सामने खोल दिए जाएं। 
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मन की दुविधा ख़त्म होते ही इश्क़ मुकम्मल हो जाता है 

8 वर्ष पहले

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