कैसे बयां करूँ महिमा माँ की
ये साँसे चल रही माँ की मेहरबानी से ।
जब-जब मुसीबत आई सर पे
सरक गई परे माँ की मेहरबानी से ।
जब-जब रोई माँ के दरबार में
मुस्कुरा के निकली माँ की मेहरबानी से ।
ज़माने के ज़ख्म दिखाये दरबार में
मरहम के साथ निकली माँ की मेहरबानी से ।
किराए के घरों में भटक रहे थे
अपना ठिकाना बना माँ की मेहरबानी से ।
कितने हादसों से बच के निकले
करिश्मा हो गया माँ की मेहरबानी से ।
- यतिराज बजाज "प्रेरणा"
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