आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

देवी माँ की मेहरबानी

                
                                                         
                            कैसे बयां करूँ महिमा माँ की
                                                                 
                            
ये साँसे चल रही माँ की मेहरबानी से ।

जब-जब मुसीबत आई सर पे
सरक गई परे माँ की मेहरबानी से ।

जब-जब रोई माँ के दरबार में
मुस्कुरा के निकली माँ की मेहरबानी से ।

ज़माने के ज़ख्म दिखाये दरबार में
मरहम के साथ निकली माँ की मेहरबानी से ।

किराए के घरों में भटक रहे थे
अपना ठिकाना बना माँ की मेहरबानी से ।

कितने हादसों से बच के निकले
करिश्मा हो गया माँ की मेहरबानी से ।

- यतिराज बजाज "प्रेरणा"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर