किसी इतिहास के पन्ने पर मेरा नाम नहीं है।
है केवल मेरे हाथों से बनाए राजमहलों की छाया।
मैंने पत्थरों में सभ्यता का नक्शा उकेरा,
उन्होंने उन्हीं पत्थरों के सीने पर अपना नाम लिख दिया।
मैं नामहीन—
लेकिन मेरे पसीने पर ही अशोक का स्तंभ खड़ा है,
ताजमहल की श्वेत निस्तब्धता
और
लाल किले की लाल दीवारें
आज भी मेरे दोनों हाथों की धूल छिपाए हुए हैं।
कौन लिखेगा मेरे दोनों हाथों का इतिहास?
इतिहास ने तो केवल सम्राटों के नाम लिखे हैं।
हाँ,
श्रमिक के दोनों हाथों में सभ्यता की ऊष्मा नहीं—
बस क्षीण होती रोशनी के भीतर लौट जाने का एक रास्ता है।
मार्क्स ने शायद कभी इतिहास का एक और द्वार खोला था—
श्रम के मूल्य के भीतर मनुष्य का चेहरा खोजते हुए।
लेकिन युग बदल गए,
फिर भी मेरे हाथों पर आज वही धूल है।
मैं सभ्यता की नींव का पत्थर हूँ,
लेकिन उद्घाटन-पट्टिका पर मेरा नाम नहीं।
मेरे माथे के पसीने से जो शहर रोशन होता है,
उस शहर की चर्चाओं में
मेरे अँधेरों की कोई बात नहीं होती।
मैं काम करता हूँ—
क्योंकि इतिहास मेरे बच्चे को राजमुकुट नहीं देगा;
केवल एक रोटी के लिए
मेरे दोनों हाथ हर दिन पृथ्वी से युद्ध करते हैं।
शताब्दियाँ बीत जाती हैं—
पत्थरों का रंग बदल जाता है,
मुकुट बदल जाते हैं, सिंहासन बदल जाते हैं,
बदल जाते हैं देशों के नाम,
केवल—
नहीं बदलता हमारा भाग्य।
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