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फिर चुपके से चेहरे पे लौटती हँसी।

                
                                                         
                            वो राखी, वो बचपन, वो आँसू, वो हँसी,
                                                                 
                            
दिल के किसी कोने में है आज भी बसी।

वो आँगन, वो झूला, वो सावन की फुहारें,
वो भाई की कलाई, वो बहना की ख़ुशी।

वो कच्चे से रिश्ते, वो पक्की मोहब्बत,
न दौलत की चाहत, न दुनिया की कमी।

वो रूठना, वो मनाना, वो छोटी-सी लड़ाई,
फिर चुपके से चेहरे पे लौटती हँसी।

वो काग़ज़ की नावें, वो बारिश का पानी,
वो गलियों में दौड़ती बचपन की ख़ुशी।

वो बहना की ज़िद थी, वो भाई की शरारत,
वो पल थे अनमोल, न थी कोई कमी।

वो राखी के धागे में बँधी थी दुआएँ,
वो धागा ही बन गया रिश्तों की नमी।

कभी भाई की आँखों में बहना की चिंता,
कभी बहना के दिल में भाई की कमी।

वो घर अब भी शायद वही है मगर अब,
न आँगन में वैसी है बच्चों की हँसी।
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एक घंटा पहले

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