इन परिंदों की मैं आवाज उठा लाई हूं
अपने लफ़्ज़ों में मैं कुछ खास उठा लाई हूं
चाह जागी है मुझ में आगे बढ़ने की
उन से सीखी हुई परवाज़ उठा लाई हूॅं।
करते रहते हैं वो मेहनत हर पल
उनकी खातिर मैं ये अंदाज उठा लाई हूॅं।
क्यों उनकी भूख प्यास की तुम फ़िक्र नहीं करते
मैं इन नादान मासुमों के जज़्बात उठा लाई हूॅं ।
हम सब ही तो हैं उस करीम रब की मखलूक
कूद में जागे हुए अहसास उठा लाई हूॅं।
हर परिंदा हमें देता है अम़न का पैगाम
अपने रब की दी हुई सौगात उठा लाई हूॅं।
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