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जैसे दावत दे रहा हो नदी को समुन्दर।

                
                                                         
                            याद है उसका आवरण कैसे छुआ मुझे,
                                                                 
                            
जैसे दावत दे रहा हो नदी को समुन्दर।

इश्क मुकम्मल होता कहाँ इंसान का,
तड़पन छोड़कर जाता जिस्म के अन्दर।

राहत जरूर मिलती इधर भी उधर भी,
अल्फाज़ पहुँचते वक्त पर उसके अन्दर।

एहसास जगह बना लेते अपने तरीके से,
धीरे-धीरे ही कायम होता रूह के अन्दर।

मंझधार से किश्ती को निकालेगा कौन,
फरिश्ता नही 'उपदेश' न राम का बन्दर।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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1 hour ago

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