अब लौटेगा नहीं रूठ गया ज़माने से।
सच में खफ़ा हो गए मेरे मुस्कुराने से।।
ज़माने के चलन से तन्हाई हल्दी बनी।
आदतें उसकी बिगड़ी श्मशान जाने से।।
दिल में दर्द कभी इधर कभी नीचे होता।
थोड़ा आराम आता उसकी याद आने से।।
बेरौनक सी लग रही अब महफ़िल सारी।
मेरा दिल बहलता दोस्तों के समझाने से।।
दोस्त चाँद पर सवार मददगार कोई नहीं।
अब बचाएगा कौन 'उपदेश' खज़ाने से।।
- उपदेश कुमार शाक्यवार 'उपदेश'
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