आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुछ ख्वाहिशें तुम्हारी वज़ह से थी।

                
                                                         
                            जिंदा हूँ रोज़ देखकर तस्वीर तेरी।
                                                                 
                            
पूरी कैसे होंगी जिम्मेदारियाँ मेरी।।

कैसे बयाँ करूँ तुमसे बिछुड़ कर।
और बढ़ने लगी परेशानियाँ मेरी।।

कुछ ख्वाहिशें तुम्हारी वज़ह से थी।
उस वज़ह से रही मजबूरियाँ मेरी।।

किस तरह दिल से चाहा था तुम्हें।
और तुम्हीं ने बढ़ा दी दूरियाँ मेरी।।

तुम्हारा माथा चूम के थी खुश बहुत।
लुट गई 'उपदेश' जैसे दुनियाँ मेरी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
30 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर