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ज्यादा क्या कहूँ 'उपदेश' बस इतना समझो।

                
                                                         
                            तुम्हारे जाने का गम छोड़ेगा नही मुझको।
                                                                 
                            
तसल्ली देने का सबब सिखाने आते मुझको।।

गुज़रे वक्त की देहरी में कैद हो गई जब से।
भटकती रूह सहारे नजर आते नही मुझको।।

अब देखती हूँ आईने में ये आँखें गैर लगती।
बेताबी में जीने के बहाने आते नही मुझको।।

आँखों की मेढ रूठे आसुओं को न रोकती।
अपनेआप बहते सम्हालने आते नही मुझको।।

रंगों से नाराजगी रूढ़िवादी प्रथा ज़माने की।
खामोश लबों पर वो तराने आते नही मुझको।।

ज्यादा क्या कहूँ 'उपदेश' बस इतना समझो।
ख्वाब में भी अब तुम छूने आते नही मुझको।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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1 hour ago

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