बाद सावन भी तुमको न बिसराऊँगी
तेरी चौखट पे निसदिन चली आऊँगी
मर के भी तुमसे बंधन नहीं तोड़ूँगी
उस जनम में भी तेरी ही कहलाऊँगी
— त्रिशिका धरा
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