"अर्ध देह मानव रचित, मुख दिहो सिंह बनाए,
बाहुबल ईश्वर सृजित, तब नरसिंह कहाए।"
स्तंभ फटा, नभ काँप उठा, थर्राया संसार,
गर्जन सुनकर दिशि-दिशि बोली—आया काल विकार।
धरा नहीं थी, गगन नहीं था, संध्या का वह काल,
न भीतर था, न बाहर था—द्वार बना रणस्थल विशाल।
नख से शिख तक ज्वाला जागी, भृकुटि बनी प्रलय,
रोम-रोम में गर्जन गूँजे, काँप उठा आलय।
केश बने घनघोर घटाएँ, नेत्र बने अंगार,
दाँतों में दावानल चमका, नख में मृत्यु अपार।
मानव तन था आधा उनका, आधा सिंह स्वरूप,
एक देह में धधक रहा था, युग का सारा रूप।
न नर था वह, न पूर्ण मृग था, कैसा अद्भुत भेद,
वरदानों के मद में डूबे, दैत्य का टूटे छेद।
गोद उठाकर दैत्य को, सिंह ने भुजबल ताना,
न अस्त्र चला, न शस्त्र चला, न मृत्यु ने मार्ग बताना।
न दिन था वह, न रात थी वह, संध्या की वह रेख,
न मनुष्य था, न पशु था वह—टूट गया वरदान का लेख।
हिरण्यकशिपु चीत्कार उठा—“मैं मृत्यु को जीत चुका!”
नख हँसे नरसिंह के जैसे—“अभी कहाँ तू जीत चुका?”
जिस अमरत्व पर गर्व किया था, वह माया का जाल,
मृत्यु से बचने का वर भी, मृत्यु से बचा न काल।
"प्रह्लाद!” पुकारा जग ने, अश्रु भरे लोचन,
छोटा-सा वह भक्त खड़ा था, निर्भय उसका मन।
जिसके अधरों पर हरि थे, जिसके हृदय में धाम,
उस बालक की रक्षा करने, स्वयं उतर आए श्रीराम।
प्रह्लाद! नयन उठाकर देखो, मैं ही तेरा त्राण,
भय मत करना, भक्त मेरे—मैं ही तेरा प्राण।
जो मेरे चरणों में आए, उसका कौन बिगाड़े?
दीन हृदय में नाम जो मेरा, कौन उसे फिर मारे?
सिंहासन, सत्ता, स्वर्ण-महल सब धूल हुए उस क्षण,
एक भक्त के सत्य ने जीता, दैत्य का सारा दर्पण।
जिसने रोका नाम हरि का, जिसने भक्ति को बाँधा,
उसके भाग्य ने उसी क्षण अपना अंतिम लेखा साधा।
न राज्य बचा, न मद बच पाया, न बच पाया अभिमान,
बच गया केवल सत्य सनातन, बच गया भगवान।
क्रोध था वह धर्म का क्रोध, अन्यायों पर वार,
करुणा थी उस क्रोध के भीतर, भक्तों का आधार।
नरसिंह के नखों में केवल दैत्य-वध की आग नहीं,
उनमें यह उद्घोष छिपा था—“भक्ति कभी निष्फल नहीं।”
जो पूजा से रोके किसी को, जो ध्यान करे अपमान,
जो सत्य दबाए शक्ति के बल—उसका भी होगा अवसान।
असुरता चाहे रूप बदल ले, युग चाहे बदल जाए,
धर्म जहाँ भी रोका जाएगा, नरसिंह फिर आए।
जब-जब सत्ता सत्य कुचले, जब-जब बढ़े अँधियारा,
स्तंभ-स्तंभ में छिपा रहेगा, उसका तेज उजियारा।
पर सुन लो तुम दंभियों! जो धर्म मिटाने आए,
जो भक्तों की भक्ति रोककर, अपना राज चलाए,
जो पापों को शक्ति समझकर, सत्य दबाने आए—
स्तंभ भले ही मौन खड़ा हो, मैं उसमें भी पाए।
न दिन देखूँ, न रात देखूँ, न कोई सीमा-रेखा,
जब धर्म पुकारेगा मुझको, टूटेगा हर लेखा।
न शस्त्र चाहिए, न अस्त्र चाहिए, न सेना, न अधिकार—
अन्याय जहाँ सिर उठाएगा, वहीं उतरूँगा मैं साकार।
भक्तों! तुम बस सत्य पकड़ना, नाम मेरा दोहराना,
अंधड़ आए, प्रलय मचे—मत अपना विश्वास गँवाना।
मैं आँसू में, मैं प्रार्थना में, मैं हर सच्चे विश्वास में,
मैं निर्बल के मौन हृदय में, मैं उसके हर श्वास में।
और दुष्टों! याद रखो—वरदानों से मृत्यु नहीं टलती,
पाप की छाया चाहे लंबी हो, अंततः ढलती।
अमरत्व का मद मत करना, मत करना अभिमान—
धर्म बचाने जब मैं आऊँ, काँपेगा सारा जहान!
देखो—फिर वह सिंह गरजा है, फिर काँपा आकाश,
“सत्य जहाँ है, वहीं मैं हूँ”—यही नरसिंह का प्रकाश।
अर्ध देह मानव रचित, मुख दिहो सिंह बनाए,
बाहुबल ईश्वर सृजित—तब नरसिंह कहाए।
भक्तों के लिए मैं करुणा, दुष्टों के लिए प्रहार—
जहाँ रहेगा सत्य और धर्म—वहीं रहेगा नरसिंह साकार।
- तनय "बाबा"
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