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मंदिर की कुछ सीढ़ियाँ चढ़ लेने से भगवान नहीं मिला करते

                
                                                         
                            मंदिर की कुछ सीढ़ियाँ चढ़ लेने से भगवान नहीं मिला करते,
                                                                 
                            
पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ लेने से ख़ुदा नहीं मिला करते।
माथे का चंदन, पेशानी का सज्दा,
बस इतना ही ईमान नहीं होता।
जब तक इंसाँ के दिल में प्रेम न उतरे,
तब तक कोई भी भगवान नहीं होता।
हाथों की माला फेरने से, मन के फेर नहीं मिटते,
लब पर आयत, श्लोक रहें, पर भीतर बैर नहीं छिपते।
पत्थर के आगे सिर झुकाने से पहले,
कभी अपने अहंकार को भी झुकाया करो।
मंदिर में दीप जलाने वाले,
किसी बुझते घर का भी उजियारा बनो।
मस्जिद में दुआ माँगने वाले,
किसी रोते चेहरे की मुस्कान बनो।
भूखे को रोटी, प्यासे को पानी,
यही सबसे पावन आरती है।
गिरते हुए को हाथ थाम लेना,
यही सबसे सुंदर इबादत है।
जो नफ़रत बोकर धर्म बचाने निकले,
वो धर्म का अर्थ कहाँ समझ पाए।
जिसने हर इंसाँ में रब को देखा,
वही उसके सबसे क़रीब पहुँच पाए।
न मंदिर से कोई छोटा होता,
न मस्जिद से कोई बड़ा होता है।
इंसाँ का असली कद तो बस,
उसके कर्मों से खड़ा होता है।
याद रखना
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ लेने से भगवान नहीं मिला करते,
पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ लेने से ख़ुदा नहीं मिला करते।
जिस दिन किसी टूटे दिल को अपना बना लोगे,
उस दिन बिना बुलाए भगवान भी मिलेंगे, ख़ुदा भी मिलेंगे।
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3 घंटे पहले

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