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"बाबरा की बे-पनाह तन्हाई"

                
                                                         
                            रुलाया न कर यूँ ऐ ज़िंदगी कि अब कोई ग़म-गुसार नहीं,
                                                                 
                            
गले से लगा कर जो चुप कराए वो हमदम-ओ-यार नहीं।
पलकों पे ठहरे जो अश्क सारे वो पोंछने वाला गया,
हमारे टूटे हुए इस दिल का अब कोई ग़म-ख़्वार नहीं।
कभी जो रूठते थे तो दुनिया मनाने को दौड़ती थी,
अब तन्हाइयों के सिवा यहाँ कोई भी परस्तार नहीं।
सुलगती रातों में ख़्वाब सारे बिखर के राख हो गए,
उजड़े चमन में बहार का अब कोई आसार नहीं।
दर्द की हद से गुज़र चुका है ये ख़स्ता-हाल आशिक़,
ज़ख़्मों पे रखने को मरहम यहाँ कोई तैयार नहीं।
हँसी के पीछे छुपे जो आँसू किसी ने देखे नहीं,
हम अहल-ए-दिल का ज़माने में कोई तलबगार नहीं।
ख़ामोश कमरे में गूँजती है सिसकियों की सदाएँ,
चीख़ों को सुनने का इस शहर में कोई रवादार नहीं।
चले गए वो जो जान कहते थे बात-बात पे कभी,
दुआएँ देने का भी अब कोई हक़दार नहीं।
अजीब मोड़ पे ला के छोड़ी है तूने ये कश्ती,
कि दूर तक भी किनारे का कोई दीदार नहीं।
हम ही ने पाले थे नाज़ कितने वफ़ा के नाम पर,
मगर हमारी तड़प का कोई भी ख़रीदार नहीं।
सुख़न में लफ़्ज़ों को अश्क कर दे तू ऐ मिरे 'बाबरा',
तिरे सिवा इस उदास दिल का कोई मो'तबार नहीं।

 
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एक घंटा पहले

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