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मिट्टी के दीपक

                
                                                         
                            मिट्टी के भी दीपक लेलो बाबूजी।
                                                                 
                            
मेरे घर भी दीवाली है बाबूजी।

शाम ढले मैं भी कुछ घर ले जाऊंगा।
दिल बच्चों का रह जायेगा बाबूजी ।

त्यौहारों की रौनक सिर्फ विदेशों में।
भारत में तो राजनीति है बाबूजी।

डोकलाम तो घड़ी-घड़ी चिल्लाते हो।
बंगले पर फिर चीनी लडियाँ बाबूजी।

अपनापन-अपनत्व बहुत ही मंहगा है।
तुम चीनी सामान उठा लो बाबूजी।

हम लोगों की क्या कोई दिवाली है?
दीपक भी है खाली-खाली बाबूजी।

सुरजीत मान जलईया सिंह


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6 वर्ष पहले

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