जमकर तुमने चौके छक्के लगाए।
जनता के जमकर पसीने छुड़ाए।
वक्त कितना हुआ जरा बतियाते।
यार तुम तो अलविदा कहने आए।
महँगाई का ग्राफ जो बढ़ता चला।
नाप के पैमाने ने जीडीपी बदला।
शेयर बिटकॉइन धूल चाटता रहा।
डॉलर तो केनवास फाड़ता चला।
नोटचोरी घरफोड़ी पीछे छूट गई।
वोटों की डकैती सबसे आगे हुई।
नेहरू भी तो कहीं मिल नही रहे।
रोजगार रसातल में है लेटा हुआ।
रुकते जरा करते दिल की बातें।
दिल के घाव तुम्हे भी दिखा देते।
प्लेन क्रैश का पता भी न चला।
आतंकी किधर बचकर निकला।
जोश गजब रहा लड़ने चल पड़े।
जीत के करीब सीजफायर हुए।
जो दहाड़ते थे जंगल मे शान से।
पतली गली पकड़ खिसक गए।
लम्बी लड़ाई में तो कानून जीता।
बलात्कारी शान से छूटके भागा।
हर कोई तो ठेंगा दिखाता जाता।
काश तू इस पल तो अपना होता।
गली में शामियाना लगा जश्न का।
किधर से बुलडोज़र धमक उठा।
व्हाट्सएप्प अंकिल टिके मोर्चे पे।
जो बार बार करवटें बदलता रहा।
सवाल आते है सब खिसक जाते।
मरनेवाले मरे जीनेवाले जी जाते।
कोई हमारे लिए तो वे नही मरे थे।
जो कहते थे वेभी साथ छोड़ चले।
मंडल में जिन्हें शान से छोड़ आए।
वहीं जाने से पांव पीछे मोड़ आए।
सगा कौन है वक्त सगा न हुआ।
दिल के जख्म और किसे बताते।
दम घुटता है दिल्ली के दबाब में।
कचरा या शुद्ध हवा के बहाव मे।
काश गांधी नेहरू फिर आ जाते।
बात बात पर उनसे तो गरियाते।
कोई सौ के कोई सवा सौ के हुए।
वे ही पूछते आजादी में कहां रहे।
कौन किससे तो मुंह यहां चुराए।
चोर साहूकार एकसे नजर आए।
हम नही हिन्दू नही मुसलमान हुए।
नही हमे किसी ने गाड़ा नही जले।
लाजबाब ये है जीते जी चल बसे।
दिल से तो टेक्स जमा करते चले।
जानेवाले को तो कौन रोक सका।
ठीक जाना है तो अब चले जाना।
समस्या आखिर हम किसे सुनाते।
दो शब्द सहानुभूति के देते जाना।
दो घड़ी ठहरते तो सुकून दे जाते।
अबतो फिर इधर नही आने वाले।
यार तुम तो अलविदा कहने आए।
वक्त कितना हुआ जरा बतियाते।
हसीना टपकी, समीकरण बदली।
नन्हे मुन्ने अब तो, आंख दिखा रहे।
लाल लाल आँखे, किसको बताते।
वे तो पहले से, बैठे लाल पीले हुए।
धू धू कर नोटों का, उठा था धुआं।
लपटों में मगर, संविधान ही तो था।
बेबस कोर्ट, न्यायविद के अट्टहास।
बेबस कोने में, तुम चश्मदीद बने।
कोई हसीना से, अँखियाँ जब लड़ी।
पल पल हर पल, जो पहलू में खड़ी।
परवाह नही, जमाना जाए भाड़ में।
मुस्कान देख, बल्लियों उछले दिल।
कश्मीर फाइल्स है केरला फाइल्स।
बेंगाल फाइल्स का, डंका पीटा गया।
एप्सटीन फाइल्स का निकला जिन्न।
जाने किधर से, इतिहास खुदता रहा।
जाते जाते यीशु भी, आए है दांव पे।
पूछते पिता बिन, कैसे हुआ ये जन्म।
बेचारे भूल आए, रामायण या पुराण।
राम अवतरित, खीर पात्र यज्ञपुरुष।
खेलते लहरों से, नफरत का सैलाब।
न डर डूबना क्या,अब इस बहाव में।
बौराए चल पड़े,ले युवाओं की भीड़।
डर नही कब, दिशा बदलेगा सैलाब।
जहां खड़ा है नाकामियों का स्मारक।
नेस्तनाबूद कर, वहीं बनाते नई कब्र।
महत्व धरोहर का, कम न कर सके।
शायद इस बहाने, यह याद दर्ज रहे।
तुम गवाह थे क्या क्या तुम्हें बताए।
मनोरंजन यह, जान हमारी ले गया।
वक्त कितना ही हुआ लो बतियाए।
यार तुम तो अलविदा कहने आए।
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