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दर-ए-जन्नत की आरज़ू वालों

                
                                                         
                            मैंने कब चाहा है कि सातों जनम मेरे साथ चलो,
                                                                 
                            
बस जिंदगी बसर हो जाए इतना मेरे साथ चलो,

एक चाँद को अपनी चांदनी पर गज़ब का गुरुर हैं,
रोशनी की आज़माइश है, सितारों मेरे साथ चलो,

हिमाचल की कोख में एक ख़ूबसूरत दुनिया बसी है,
दर-ए-जन्नत की आरज़ू वालों, चम्बा मेरे साथ चलो,

ज़रूरी तो नहीं, हर सड़क जाती हो मंजिल तलक,
हौशले की मिशाल दो, पखडंडियों के साथ चलो,

सुना है, तुम्हारा हमसफर से भी मन ऊब जाता है,
गर ये शर्त है, तो चलो अपने मन तक साथ चलो,

अक्सर हवा के साथ चलती किश्तिया डूब जाती है,
बगावत आज़ादी हो अगर, हवा के खिलाफ़ चलो,

कहता है, क्या मुश्किल है लिखना बस इक ग़ज़ल,
मेरे रास्ते आसान लगते है, एक बार मेरे साथ चलो,

जिस शय पर तुम्हारा दिल आये, मानो तुम्हारी है
मेरी बिसात ना पूछो, तुम बाज़ार मेरे साथ चलो,

तुम्हारे ख्यालों को सुन कर, सब तुम्हें पागल समझेंगे,
सबसे कहती फिरती हो, तन्हा चलो पर आज़ाद चलो....
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एक वर्ष पहले

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